छत्तीसगढ़ का किसान अब पारंपरिक खेती के ढर्रे को तोड़कर नए प्रयोग कर रहा है। बलौदाबाजार जिले के सिमगा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम औरेठी में इन दिनों पीली चमक बिखेरते सूरजमुखी के फूल आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। यहाँ के युवा किसानों ने यह साबित कर दिया है कि ‘कम पानी’ का मतलब ‘कम कमाई’ नहीं होता।
धान के नुकसान से ली सीख, अब सूरजमुखी से उम्मीद
ग्राम औरेठी के किसान आकाशदीप वर्मा और संजय वर्मा ने पिछले साल गर्मी के मौसम में धान की फसल लगाई थी। लेकिन गिरते वॉटर लेवल (भूजल स्तर) के कारण उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ा। इस साल उन्होंने रास्ता बदला और कृषि विभाग के सहयोग से 12 एकड़ में सूरजमुखी की खेती शुरू की।
आकाशदीप बताते हैं कि सूरजमुखी की खेती के कई फायदे हैं:
- पानी की बचत: धान के मुकाबले इसमें नाममात्र का पानी लगता है।
- सुरक्षा: इस फसल को न तो आवारा पशु खाते हैं और न ही बंदर नुकसान पहुँचाते हैं।
- कम मेहनत: 90 से 100 दिनों में फसल तैयार हो जाती है और देखरेख की कम जरूरत पड़ती है।
कमाई का गणित: 50 हजार तक का शुद्ध मुनाफा
खेतों में फसल की स्थिति को देखते हुए इस बार प्रति एकड़ 8 से 10 क्विंटल उत्पादन का अनुमान है। बाजार में सूरजमुखी तेल की बढ़ती मांग के कारण किसानों को उम्मीद है कि उन्हें प्रति एकड़ 45 से 50 हजार रुपये की शुद्ध आय प्राप्त होगी। यह पारंपरिक फसलों के मुकाबले 2 से 3 गुना अधिक है।
प्राकृतिक खेती और नवाचार का संगम
आकाशदीप वर्मा केवल खेती ही नहीं कर रहे, बल्कि पशुपालन के साथ इसे प्राकृतिक खेती से भी जोड़ रहे हैं। वे गोबर और गौमूत्र से जीवामृत और घनजीवामृत तैयार कर अपने खेतों में उपयोग कर रहे हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ रही है और खाद का खर्च भी बच रहा है।
कृषि विभाग का साथ
उप संचालक कृषि ने बताया कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत किसानों को संकर बीज और तकनीकी मार्गदर्शन दिया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि किसान दलहन और तिलहन फसलों को अपनाएं ताकि फसल चक्र में विविधता आए और मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहे।
औरेठी के इन किसानों की सफलता अब आसपास के गांवों के लिए प्रेरणा बन गई है। जिले के अन्य किसान भी अब ग्रीष्मकालीन धान की जगह कम पानी वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
