जशपुर:
मानव और हाथियों के बीच बढ़ते द्वंद्व की खबरों के बीच छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से एक सकारात्मक और संवेदनशील तस्वीर सामने आई है। पत्थलगांव वन परिक्षेत्र के ग्राम शेखरपुर में ग्रामीण पिछले कई वर्षों से जंगली हाथियों की स्मृति को भगवान गणेश की आस्था से जोड़कर गणेश उत्सव मनाते आ रहे हैं। ग्रामीणों की यह अनोखी ‘गज श्रद्धा’ आज पूरे क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण और सुरक्षित सह-अस्तित्व का बड़ा उदाहरण बन चुकी है।
2009 की दुखद घटना से हुई थी शुरुआत
इस परंपरा की जड़ें 17 साल पुरानी एक घटना से जुड़ी हैं। वर्ष 2009 में शेखरपुर गांव में करंट लगने से दो जंगली हाथियों की अकाल मौत हो गई थी। इस हादसे से ग्रामीण बेहद आहत हुए। उन्होंने हाथियों को भगवान गणेश का स्वरूप मानते हुए पूरे विधि-विधान और हिंदू रीति-रिवाज से उनका अंतिम संस्कार किया। इसके बाद ग्रामीणों ने उसी स्थल पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की। तब से हर साल गणेश चतुर्थी के मौके पर यहां पूरे श्रद्धा भाव से उत्सव मनाया जाता है।
‘गजरथ’ कार्यक्रम के जरिए सुरक्षा और संरक्षण का संकल्प
इस वर्ष भी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वन परिक्षेत्र पत्थलगांव की ओर से 22 सितम्बर को शेखरपुर में ‘गजरथ’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम के दौरान वन विभाग के अधिकारियों और मैदानी अमले ने ग्रामीणों को हाथियों से जुड़े जरूरी व्यवहारिक पहलू समझाए:
- हाथियों के प्राकृतिक आवास और उनके आवागमन के रास्तों का सम्मान करना।
- जंगल या खेतों में हाथियों की मौजूदगी के दौरान सुरक्षित दूरी बनाए रखना।
- मानव-हाथी द्वंद्व (कॉन्फ्लिक्ट) की स्थिति से बचने के लिए जरूरी सावधानियां और त्वरित सूचना तंत्र।
गणेश प्रतिमा के विसर्जन के साथ इस कार्यक्रम का समापन हुआ, जहां ग्रामीणों ने वन्यजीवों के संरक्षण का संकल्प दोहराया।
संस्कृति और संरक्षण का जमीनी तालमेल
जशपुर का यह इलाका लंबे समय से हाथियों की आवाजाही वाला क्षेत्र रहा है। ऐसे में शेखरपुर के ग्रामीणों की यह पहल केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि अगर संवेदनशीलता और सही समझ हो, तो जंगल और इंसानी बस्तियों के बीच का टकराव काफी हद तक कम किया जा सकता है। वन विभाग ने भी ग्रामीणों की इस पहल को सराहा है और इसे समुदाय-आधारित संरक्षण का मजबूत मॉडल माना है।