विशेष रिपोर्ट: प्रवीन कुमार सिंह |
जशपुर | 23 सितंबर 2026
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय संगठन ने हालिया संगठनात्मक नियुक्तियों में कई बड़े फैसले लेकर सबको चौंकाया है। एक तरफ जहां पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ का प्रदेश प्रभारी और सिद्धार्थ शंभू को सह-प्रभारी नियुक्त किया गया है, वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ की एक कद्दावर महिला आदिवासी नेत्री को देश के सबसे हाई-प्रोफाइल राजनीतिक राज्य गुजरात की कमान सौंपी गई है।
रायगढ़ की पूर्व सांसद और पत्थलगांव से वर्तमान विधायक श्रीमती गोमती साय को भाजपा ने गुजरात प्रदेश का सह-प्रभारी बनाया है।
इस नियुक्ति के साथ ही सियासी गलियारों में एक सवाल गूंज रहा है—आखिर गोमती साय में ऐसा क्या खास है कि राष्ट्रीय नेतृत्व ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के गृह राज्य में संगठन को धार देने के लिए उन पर दांव लगाया? इसका जवाब छिपा है उनके उस सियासी रिकॉर्ड में, जहां वे अपने राजनीतिक जीवन में आज तक ‘एक भी चुनाव नहीं हारीं’।
पंचायत से शुरू हुआ अजेय सफर: जब पहली बार में ही फहराया जीत का परचम
जशपुर की माटी से निकलीं गोमती साय का सार्वजनिक जीवन जमीनी संघर्ष और महिला नेतृत्व की जीवंत मिसाल है।
- 2015 से 2019 (जिला पंचायत अध्यक्ष): गोमती साय ने मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में मजबूती से कदम रखते हुए जशपुर जिला पंचायत अध्यक्ष का दायित्व संभाला। ग्रामीण विकास और त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में उनकी जमीनी पकड़ ने उन्हें संगठन की नजरों में ला खड़ा किया।
- 2019 (संसद का सफर): पार्टी ने 2019 के आम चुनाव में उन पर बड़ा भरोसा जताया और रायगढ़ (अजजा) लोकसभा सीट से प्रत्याशी बनाया। पहली ही बार में उन्होंने भारी मतों से जीत दर्ज कर संसद की दहलीज पर कदम रखा और लोकसभा में जनजातीय सरोकारों की मुखर आवाज बनीं।
2023 का वह रोमांचक मुकाबला: जब महज 255 वोटों से रचा इतिहास
2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपनी रणनीति के तहत तत्कालीन सांसद गोमती साय को विधानसभा के रण में उतारा। सीट थी—पत्थलगांव, जो कांग्रेस का मजबूत गढ़ मानी जाती थी और जहां से कद्दावर राजनेता रामपुकार सिंह मैदान में थे।
यह मुकाबला छत्तीसगढ़ के चुनावी इतिहास के सबसे करीबी और सांसें थाम देने वाले मुकाबलों में शुमार हो गया। वोटों की गिनती के अंतिम क्षणों तक चले कड़े संघर्ष के बाद गोमती साय ने महज 255 मतों के अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
इस जीत ने साबित कर दिया कि जमीनी पकड़, मतदाताओं से सीधा संवाद और कार्यकर्ताओं की एकजुटता के दम पर वे किसी भी दुर्ग को भेद सकती हैं। जिला पंचायत, लोकसभा और फिर विधानसभा—तीनों स्तरों पर लगातार जीत के इसी अनूठे रिकॉर्ड की बदौलत समर्थक और राजनीतिक विश्लेषक उन्हें “राजनीति की अपराजिता” कहने लगे।
गुजरात का रण: क्यों मिला गोमती साय को यह दायित्व?
गुजरात भाजपा का सबसे मजबूत संगठनात्मक मॉडल माना जाता है। ऐसे राज्य में गोमती साय को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी मिलना केवल एक पद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर उनके बढ़ते कद का स्पष्ट प्रमाण है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, इसके पीछे तीन मुख्य रणनीतिक कारण हैं:
- मजबूत जनजातीय कनेक्ट: गुजरात में पूर्वी पट्टी (उमरगाम से अंबाजी तक) में एक बड़ा आदिवासी वोट बैंक है। एक महिला आदिवासी नेत्री के रूप में गोमती साय का संगठनात्मक अनुभव गुजरात के जनजातीय इलाकों में पार्टी की पकड़ को और मजबूती देगा।
- संगठनात्मक निष्ठा और सहजता: कार्यकर्ताओं के बीच सादगी और सीधा संवाद गोमती साय की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) रही है।
- चुनावी प्रबंधन की समझ: कठिन से कठिन चुनावी समीकरणों को पक्ष में मोड़ने की उनकी क्षमता संगठन के लिए मुफीद साबित होगी।
अगली राजनीतिक पारी पर टिकीं निगाहें
सरगुजा विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष और पत्थलगांव विधायक के रूप में स्थानीय विकास की कमान संभाल रहीं गोमती साय अब राष्ट्रीय पटल पर अपनी सांगठनिक क्षमता का लोहा मनवाने के लिए तैयार हैं।
जशपुर के दूरस्थ अंचल से निकलकर गुजरात जैसे औद्योगिक और राजनीतिक रूप से अग्रणीय राज्य के संगठन की धुरी बनना यह बताता है कि भाजपा के भीतर काम करने वाले जमीनी चेहरों के लिए अवसर असीमित हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि छत्तीसगढ़ में अजेय रहीं ‘अपराजिता’ गोमती साय गुजरात की सांगठनिक पिच पर अपनी इस नई पारी को किस ऊंचाई तक ले जाती हैं।