आजीविका डबरी और सरकारी अनुदान से बदला वनांचल का अर्थशास्त्र; लमगांव की संध्या हर महीने बचा रहीं ₹15,000, बाबूनाथ और सनी लाल ने बंजर जमीन पर उगाया मुनाफा
अंबिकापुर/रायपुर। सरगुजा के वनांचल में पारंपरिक खेती-किसानी अब केवल पेट भरने का जरिया नहीं रही, बल्कि पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन के साथ जुड़कर आर्थिक समृद्धि का मजबूत मॉडल बन चुकी है। राज्य शासन की योजनाओं, तकनीकी मार्गदर्शन और अनुदान के दम पर ग्रामीण न केवल अतिरिक्त आय जुटा रहे हैं, बल्कि स्वरोजगार की मिसाल भी पेश कर रहे हैं। लमगांव की संध्या, शिवनाथपुर के अनिल और सकालो के बाबूनाथ जैसे किसानों की जमीनी सफलता यह साबित करती है कि संसाधनों के सही उपयोग से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर कैसे बदली जा सकती है।
केस 1: लमगांव की संध्या की डेयरी से हर माह ₹15,000 की बचत
ग्राम लमगांव की निवासी संध्या ने वर्ष 2024 में राज्य डेयरी उद्यमिता विकास योजना के तहत मिले अनुदान से डेयरी व्यवसाय की शुरुआत की।
- रोजाना उत्पादन: लगभग 30 लीटर दूध
- दैनिक आय: करीब ₹1,200 (खर्च काटकर प्रतिमाह ₹15,000 की शुद्ध बचत)
- सालाना मुनाफा: ₹1 लाख से ₹1.5 लाख तक
- फ्यूचर प्लानिंग: संध्या वर्तमान में गायों से मिली 3 बछियों को आगामी ब्रीडिंग के लिए तैयार कर रही हैं, जिससे आने वाले दिनों में दूध उत्पादन और आमदनी दोनों में इजाफा होगा।
केस 2: दो कमरों से शुरू हुआ अनिल का सूकर पालन बना स्थायी रोजगार
ग्राम शिवनाथपुर निवासी अनिल कुमार खेस ने साबित किया है कि बड़ा काम शुरू करने के लिए भारी-भरकम पूंजी की दरकार नहीं होती। वर्ष 2018 में पशुधन विकास विभाग की सूकर प्रदाय योजना के तहत उन्होंने घर के महज दो कमरों से सूकर पालन की शुरुआत की थी। सीमित जगह और विभागीय सलाह के दम पर उन्होंने इसे मुख्य आजीविका बना लिया। आज उनका यह उद्यम गांव के अन्य युवाओं को पशुधन आधारित स्वरोजगार अपनाने की राह दिखा रहा है।
केस 3: आजीविका डबरी से दोहरा फायदा—सिंचाई भी और मछली पालन भी
महात्मा गांधी नरेगा और ग्रामीण रोजगार योजनाओं के तहत तैयार ‘आजीविका डबरी’ (तालाब) जल संरक्षण के साथ कमाई का मजबूत जरिया बन चुकी है:
- सकालो के बाबूनाथ: डबरी के गहरीकरण से पहले खेतों में पानी की भारी किल्लत थी। अब भरपूर पानी मिलने से वे बड़े पैमाने पर मौसमी हरी सब्जियां उगा रहे हैं, जिससे रोजमर्रा का खर्च निकल रहा है। इसके साथ ही उन्होंने डबरी में मछली बीज डालकर मत्स्य पालन शुरू किया है, जिससे अतिरिक्त आमदनी का रास्ता खुला है।
- खाली पड़ी जमीन पर सनी लाल का कमाल: पहले जिस जमीन का कोई उपयोग नहीं हो पा रहा था, वहां डबरी बनने के बाद वर्षा जल का संचयन हुआ। अब सनी लाल डबरी में मछली पालन कर रहे हैं और मेड़ों व आसपास की जमीन पर सब्जी उत्पादन कर रहे हैं।
परंपरागत खेती से बहुआयामी मॉडल की ओर बढ़ता गांव
राज्य शासन की नीतियों के चलते सरगुजा संभाग में किसान अब सिर्फ एक फसल के भरोसे नहीं हैं। डेयरी विकास योजना से नियमित कैश फ्लो मिल रहा है, सूकर पालन से कम लागत में स्वरोजगार खड़ा हो रहा है और आजीविका डबरी जल संकट दूर करने के साथ-साथ मछली व सब्जी उत्पादन का दोहरा लाभ दे रही है।
